हाथों में तेरा हांथ हों।
उगते सूरज की लालिमा,
वाह फिर क्या बात हो।।
तुम मुझे और मैं तुम्हें,
बस देखता ही रहूं।
न कुछ तुम कहो,
न कुछ मैं कहूं।।
एक अजब सी चमक,
चहरे पर दिखती तेरे।
बड़े ही सुन्दर लगते हैं,
बाल ए बिखरे तेरे।।
न शहरों का शोरगुल,
न गांवों की तांका झांकी।
एक तुम हो एक हम हैं,
पीछे रह गई दुनिया बाक़ी।।
जो सुकून तेरे साथ में,
वो स्वर्ग में भी हैं नहीं।
तेरे जैसा यार स्वरूप
और कोई मेरा नहीं।।
ए समय कास ठहर जायें,
मौसम सुहाना मन भाए।
सजनी संग साजन मिल,
प्रीति प्यार के गीत गाए।।
सूबेदार रामस्वरूप कुशवाह बैंगलौर कर्नाटक
स्वरचित कविता 15/10/2024
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