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Tuesday, October 15, 2024

मेरी कलम से : लोकेश कौशिक

दूर ढलते सूरज सी रोशनी सा,
प्यार हमारा कहीं खो ना जाए प्रिया,
जमाना कभी नहीं हुआ इस जहां में 
किसी का सच्चा प्यार नहीं बदलता कभी प्रिया।

आओ अब दिन ढल गया है,
अब बिछड़ने का समय हो गया है 
पंछी भी घोंसलों को लौट गए हैं 
लहरें भी शांत किनारों में खो गई हैं 
अब हम ही किनारे पर खड़े रह गए हैं।

© लोकेश कौशिक 

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