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Friday, October 18, 2024

सीखना : डॉ. लूनेश कुमार वर्मा

सीखना
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व्यक्ति जीवन भर सीखता है 
व्यक्ति में सीखने की ललक 
सदा बनी रहनी चाहिए 
जिस दिन व्यक्ति 
सीखना बंद कर देता है 
उस दिन उसका 
विकास रुक जाता है 
थम जाता है वह 
मर जाता है वह 
सफल होना चाहते हैं यदि
अपने भीतर के विद्यार्थी को 
सदैव जीवित रखिए 
नित सीखने का भाव 
आचरण में रखिए 
चाहे पहुंच जाए जहां भी 
ललक कम नहीं होनी चाहिए 
जो हैं शिक्षक, देते हैं शिक्षा 
उनका है यह महत्वपूर्ण दायित्व 
स्वयं पहले विद्यार्थी बनें 
नई चीजों को सीखने के आग्रही बनें 
नित अध्ययनशील बनें
कोई नहीं होता सर्वज्ञ 
कोई नहीं होता है पूर्ण 
जब व्यक्ति सीखना बंद करता है 
विकास अवरुद्ध  हो जाता है
सीखना सतत प्रक्रिया है 
इसे सदैव बना कर रखें 
समय के साथ 
कदम से कदम मिलाकर चलते रहें।

– डॉ. लूनेश कुमार वर्मा

Thursday, October 17, 2024

ओस की बूंदें - डॉ. लूनेश कुमार वर्मा

ओस की बूंदें - डॉ. लूनेश कुमार वर्मा
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शीतकाल की रजनी 
शस्य श्यामला धरित्री 
चहुं ओर हरीतिमा
स्वच्छ वातावरण 
उषा काल की बेला 
छोटे-छोटे तृणों के सिर 
शोभायमान ओस की बूंदे 
चमकते मोती सम 
लगते मनोरम।
निकलते जो प्रातः 
पाते सुखद अनुभव 
स्वास्थ्य हितकारी 
ओस की बूंदें मनोहारी।
खेत खलिहान मैदानों में 
बिखरे आनंदमय दृश्य 
प्रकृति रूप अनुपम 
शीतलता सुखदायक 
ओस की बूंदें मंगलकारक।
जीवन क्षणभंगुर इनका
अल्पकाल में हर्षवर्धन 
करता अपना जीवन सफल 
देता सीख जगत को
लो जीवन का आनंद सदा।


डॉ. लूनेश कुमार वर्मा

Wednesday, October 16, 2024

उत्कंठा

उत्कंठा 

किसी भी कार्य को करने के लिए 

उत्कंठा का होना आवश्यक है 

बलात् किए जाने वाले कार्य 

अनमने ढंग से किया जाता है 

ऐसे में कार्य की सफलता 

सदैव संदिग्ध बनी रहती है।

कार्य में उत्कंठा का 

होता है जब समावेश 

उत्साह का संचार होता है 

कार्य में कुशलता आती है 

कार्य करने वाला 

आनंद का अनुभव करता है। 

स्वेच्छा से किए जाने वाले कार्य में 

उत्कंठा के समावेश से 

कार्य में नवीनता आती है 

स्वरूप में निखार आता है 

कला का अनोखा रूप प्रकट होता है।

करें जब भी कोई कार्य 

पूरे मनोयोग से करें 

जिजीविषा के साथ करें 

मन में उत्साह लेकर करें 

कार्य को करने के लिए 

लालायित रहें, उत्कंठित रहें


– डॉ. लूनेश कुमार वर्मा 

नन्हीं गौरैया

शीर्षक— नन्हीं गौरैया

पहले सुबह आंखे खुलती थीं
चहकती हुई नन्हीं सी चिड़िया गौरैया से
सुबह पहले की
गौरैया के शोर से 
इधर उधर उड़ते हुए 
चहचह की आवाजें एक साथ कानों पर आती थीं
उस आवाज में जैसे एक उमंग
एक खुशी एक सकारात्मकता एक नई ऊर्जा रहती थी
उनका खुशी से इधर उधर आकाश में उड़ना
जीवन में 
कुछ करने का एक हौसला जैसे देता था
जो हम सबको एक नई प्रेरणा और
जीवन में आगे बढ़ने का संकेत था
अब गौरैया नहीं चहकती
आखिर क्यों
कहां गई 
किसने उसको लाकर
खड़ा किया विलुप्ति की कगार पर
मानव ने,
ना जाने कितने मोबाइल टावर लगाए
निकला जिससे खतरनाक रेडिएशन 
जिसने गौरैया की प्यारी आवाज को दबा दिया
क्योंकि हमे आदत हो गई है
मोबाइल में बजने वाले अलार्म की
इस अलार्म के आगे
गौरैया की नन्हीं आवाज नहीं आयेगी
वो अभी भी है
चहकती है 
लेकिन हमे आपको उसका चहकना नहीं सुनाई देता
वो बताती है अपना दर्द
बताती है अपना कष्ट 
जगना कभी भोर में
घर के बाहर निकलना तब सुन पाओगे
 उसकी दर्द भरी आवाज
जो पहले हमारे घरों में
 घर के पास लगे पेड़ों में
सुनाई देती थी खुशी से झूमती थी खिलखिलाती थी
खूब चहकती थी
अब इधर वो चहकना बंद है
उस प्यारी सी गौरैया का
हमारी नन्हीं सी चिड़िया का...!!!!!😔

Tuesday, October 15, 2024

मेरे जीवन साथी : सुनील कुमार खुराना

विषय-मेरे जीवन साथी 
विधा-कविता 
तुम ही हो मेरे जीवन साथी ।
तुम ही से मेरी अयोध्या काशी ।।
खाती हूं कसम मैं सदा तेरे साथ रहूं ।
तुझसे ही मैं सदा सच्चा प्यार करूं ।।
तुमसे ही है मेरे सदा जीवन डोर ।
तुम ही हो मेरे सदा सच्चे चितचोर ।।
हाथों में मेरे तेरा सदा हाथ रहे।
टूटे ना ये बंधन सदा हम साथ रहें।।
तेरा मेरा है ये जन्मों-जन्मों रिश्ता ।
सुबह-शाम करूं मैं तुम्हें ही सजदा ।।
मेरा और तेरा सदा ही ये बंधन रहे।
एक दूजे को हम सदा वंदन करते रहे ।।
तूने किया मुझ पर न जाने क्या जादू ।
मेरा मुझ रहा ना अब कोई काबू ।।
तुझ बिन मेरा कहीं मन नहीं लगता ।
जैसे मृग कस्तूरी को जंगल फिरें ढूंढता।
                स्वरचित और मौलिक कविता 
                     सर्वाधिकार सुरक्षित 
                          सुनील कुमार 
                        नकुड़ सहारनपुर 
                        उत्तर प्रदेश भारत

डॉ. लूनेश कुमार वर्मा की कविता

प्रिये

तेरा मेरा साथ हो 

कोई नहीं आस-पास हो 

हाथों में हाथ हो 

मन में विश्वास हो।


प्रकृति में बहार हो 

लालिमा का संचार हो 

मन भी तैयार हो 

हम दोनों में प्यार हो।


निकल पड़े कहीं हम 

सागर का तट हो

प्रकृति रूप अनुपम 

सूरज मद्धम हो।


हाथों में हाथ हो 

एक दूसरे का विश्वास हो 

दुनिया अपनी हो 

सदा प्रेम का संचार हो।


एक दूसरे का साथ हो 

सूर्यास्त का समय हो 

लहरों की बातें हों

प्रेम की सौगात हों।


वातावरण सुखद हो 

प्रेमी युगल का मिलन हो 

लहरों का आगमन हो 

हृदय में प्रिये उमंग हो।


– डॉ. लूनेश कुमार वर्मा 

हमराही : मोनिका डागा "आनंद"

विषय - चित्र आधारित सृजन
दिनांक - 15-10-2024
शीर्षक - हमराही
एक दूसरे पर कर अटूट विश्वास,
जीतने अपने सपनों का आकाश,
चले जो हम तुम सहर्ष साथ-साथ,
थाम हाथों में एक दूजे का हाथ ।

आशाओं का सूर्य चमका बीती रात,
आया जीवन में "आनंद" सुप्रभात,
खुशियों की हुई सुरीली चहचहाहट,
मिले हम तुम तो हुई जगमगाहट ।

बढाएं कदम दर कदम फिर पांव,
उत्साह की लहरों का सुखी बहाव,
मिली ख्वाहिशों को सुंदर पहचान,
हमने मिलकर भरी मन की उडा़न ।

अपना साथ यूं ही रहे सदा शानदार,
प्यार भरी दुनिया का मजबूत आधार,
हर लम्हा महक बिखरे गुलाबों सी,
जोडी़ रहे यादगार राधा माधव सी ।

समुंदर सा गहरा स्वछंद आसमान सा,
हमराही अपना सफ़र पूनम के चांद सा,
दीया बाती जैसे हम तुम जीवन साथी,
सच्चा प्यार हमारा उम्र भर का है साथी ।


-  मोनिका डागा "आनंद" , चेन्नई, तमिलनाडु 🙏❤️🙏 
आपके स्नेह और प्यार का धन्यवाद !💕
रचना ( स्वरचित व सर्वाधिकार सुरक्षित) ✍️








तेरा मेरा साथ : विभूति सिंह ' विख्यात'

तेरा मेरा साथ हो ,
गेरुआ आकाश हो।
हाथों में तेरा हाथ हो, 
जीवन भर का साथ हो l

मौसम का मिजाज भी, 
थोड़ा सा आशिकाना हो। 
तेरे दिल में रहूं मैं, और 
मेरे दिल में तेरा आशियाना हो।

तेरी रेशमी जुल्फें, 
मेरे कंधे पर करती हो अठखेलियां,
आंखें तेरी मुझ से पूछे, 
कुछ सरल सी पहेलियां।

यूं ही कुछ रंगीन शामें,
संग तुम्हारे बीते।
कट जाएं ये जीवन सारा,
गीत मिलन के गाते गाते।

विभूति सिंह ' विख्यात'

तेरा साथ : सूबेदार राम स्वरूप कुशवाह

तेरा मेरा साथ हों, 
हाथों में तेरा हांथ हों।
उगते सूरज की लालिमा,
वाह फिर क्या बात हो।।

तुम मुझे और मैं तुम्हें,
बस देखता ही रहूं।
न कुछ तुम कहो,
न  कुछ मैं कहूं।।

एक अजब सी चमक,
चहरे पर दिखती तेरे।
बड़े ही सुन्दर लगते हैं,
 बाल ए बिखरे तेरे।।

न शहरों का शोरगुल,
न गांवों की तांका झांकी।
एक तुम हो एक हम हैं,
पीछे रह गई दुनिया बाक़ी।।

जो सुकून तेरे साथ में,
वो स्वर्ग में भी हैं नहीं।
तेरे जैसा यार स्वरूप 
और कोई मेरा नहीं।।

 ए समय कास ठहर जायें,
मौसम सुहाना मन भाए।
सजनी संग साजन मिल,
प्रीति प्यार के गीत गाए।।
सूबेदार रामस्वरूप कुशवाह बैंगलौर कर्नाटक 
स्वरचित कविता 15/10/2024

मेरी कलम से : लोकेश कौशिक

दूर ढलते सूरज सी रोशनी सा,
प्यार हमारा कहीं खो ना जाए प्रिया,
जमाना कभी नहीं हुआ इस जहां में 
किसी का सच्चा प्यार नहीं बदलता कभी प्रिया।

आओ अब दिन ढल गया है,
अब बिछड़ने का समय हो गया है 
पंछी भी घोंसलों को लौट गए हैं 
लहरें भी शांत किनारों में खो गई हैं 
अब हम ही किनारे पर खड़े रह गए हैं।

© लोकेश कौशिक 

सीखना : डॉ. लूनेश कुमार वर्मा

सीखना ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• व्यक्ति जीवन भर सीखता है  व्यक्ति में सीखने की ललक  सदा बनी रहनी चाहिए  जिस दिन व्यक्ति ...